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Friday, January 15, 2016

आरती जय जगदीश हरे


आरती जय जगदीश हरे
ऊँ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे । 
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ।। 
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का । 
स्वामी दुख बिनसे मन का
सुख सम्पति घर आवे, बंसरी वाला घर आवे
कष्ट मिटे तन का ।।
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी ।
 स्वामी शरण गहूं मैं किसकी 
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, 
आस करूं मैं जिसकी ।। 
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी ।
स्वामी तुम अंतरयामी 
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी ।। 
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता । 
स्वामी तुम रक्षाकर्ता
मैं मुर्ख खल कामी, मै सेवक तुम स्वामी
कृपा करो भर्ता ।। 
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति । 
स्वामी सबके प्राणपति 
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति ।। 
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम रक्षक मेरे । 
स्वामी तुम रक्षक मेरे 
करुणा हस्त बढ़ाओ, अपने हाथ उठाओ
द्धार पड़ा मैं तेरे ।।
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा ।
स्वामी कष्ट हरो देवा
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, 
संतन की सेवा ।। 
ऊँ जय जगदीश हरे.. 

तन मन धन सब कुछ है तेरा 
स्वामी सब कुछ है तेरा 
तेरा तुझको अर्पण तेरा तुझको अर्पण 
क्या लागे मेरा
ऊँ जय जगदीश हरे.. 
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Monday, March 23, 2015

संतोषी माँ की आरती


आरती : संतोषी माता 

जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता |
अपने सेवक जन को सुख सम्पत्ति दाता ||

सुन्दर चीर सुनहरी माँ, धारण कीन्हों |
हीरा पन्ना दमके, तन श्रंगार लीन्हों ||

गेरु लाल घटा छवि, बदन कमल सोहे |
मन्द हँसत करुणामयी, त्रिभुवन मन मोहे ||

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चँवर ढूरे प्यारे |
धुप, दीप, मधुमेवा, भोग धरे न्यारे ||

गुड़ अरु चना परम प्रिय, तामे संतोष कियो |
संतोषी कहलाई, भक्त्तन वैभव दियो ||

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही |
भक्त्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही ||

मन्दिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई |
विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई ||

भक्त्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजै |
जो मन बसै हमारे, इच्छा फल दीजै ||

दुखी, दरिद्री, रोगी, संकट मुक्त किए |
बहु धन - धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए ||

ध्यान धर्यो जो नर तेरो, मनवांछित फल पायो |
पूजा कथा श्रवणकर, घर आंनद आयो ||

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदम्बे |
संकट तू ही निवारे, दयामयी अम्बे ||

संतोषी माँ की आरती, जो कोई नर गावे |
ऋद्धि - सिद्धि सुख - सम्पत्ति, जी भर के पावे ||

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